
रिपोर्ट:- उमाकांत पोद्दार।
चांदन/बांका:- संतान की दीर्घायु, सुख-समृद्धि एवं स्वस्थ जीवन की कामना को लेकर मनाया जाने वाला तीन दिवसीय जितिया (जीवित्पुत्रिका) पर्व क्षेत्र में पारंपरिक रीति-रिवाज एवं श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। पर्व को लेकर व्रती महिलाओं में खासा उत्साह देखा जा रहा है।पर्व के पहले दिन शुक्रवार को व्रती महिलाओं ने स्नान-पूजन के बाद भोजन ग्रहण किया। स्थानीय परंपरा के अनुसार पहले दिन मड़ुआ की रोटी और मछली खाने की भी परंपरा चली आ रही है। इसके बाद शनिवार की सुबह करीब तीन बजे सरगही की परंपरा निभाई गई। सरगही के बाद महिलाओं ने कठिन जितिया व्रत शुरू किया और करीब 24 घंटे का निर्जला उपवास रखा।जितिया की पूजा-अर्चना में खीर, खीरा, गुड़, अंकुरित मूंग सहित विभिन्न पारंपरिक प्रसाद एवं पूजन सामग्री का प्रयोग किया जाता है। व्रती महिलाओं ने विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य एवं सुख-समृद्धि की कामना की। बुजुर्गों से चली आ रही परंपरा के अनुसार पर्व के दौरान कुल-खानदान के पितृ देवताओं का स्मरण भी किया गया तथा जितिया व्रत से जुड़ी पौराणिक कथाओं का श्रवण किया गया।
राजा जीमूतवाहन के त्याग की कथा
धार्मिक मान्यता के अनुसार, जितिया पर्व का संबंध संतान की रक्षा एवं दीर्घायु से जुड़ा है। जितिया से जुड़ी पौराणिक कथाओं में राजा जीमूतवाहन के त्याग की कथा का विशेष महत्व बताया जाता है। मान्यता के अनुसार गरुड़ से नागों की रक्षा के लिए दयालु राजकुमार जीमूतवाहन ने अपने प्राणों का बलिदान देने का निर्णय लिया। उनके निःस्वार्थ त्याग से प्रसन्न होकर गरुड़ ने नागों का शिकार करना बंद कर दिया और जीमूतवाहन को जीवनदान दिया। इसी मान्यता के आधार पर संतान की रक्षा एवं लंबी आयु की कामना से जीमूतवाहन की पूजा की परंपरा जुड़ी मानी जाती है।
चील-सियारिन की कथा भी प्रचलित
जितिया व्रत से जुड़ी चील और सियारिन की कथा भी महिलाओं के बीच प्रचलित है। कथा के अनुसार, एक जंगल में चील और सियारिन गहरी सहेलियां थीं। दोनों ने महिलाओं को जितिया व्रत करते देखा और स्वयं भी व्रत रखने का निर्णय लिया। चील ने पूरे नियम और निष्ठा के साथ बिना कुछ खाए-पिए उपवास पूरा किया, जबकि सियारिन भूख सहन नहीं कर सकी और उसने छिपकर कुछ खा लिया, जिससे उसका व्रत खंडित हो गया।कथा के अनुसार, बाद में दोनों के पुनर्जन्म पर चील की संतानें जीवित और स्वस्थ रहीं, जबकि सियारिन की संतानों पर संकट आया। अपनी भूल का अहसास होने पर सियारिन को पश्चाताप हुआ। इस कथा के माध्यम से जितिया व्रत में निष्ठा, संयम और नियमों के पालन का महत्व बताया जाता है।रविवार सुबह पारंपरिक विधि-विधान एवं पूजा-अर्चना के बाद व्रती महिलाओं ने व्रत का पारण किया। पारण के दिन घर-घर में विभिन्न प्रकार के पारंपरिक व्यंजन तैयार किए गए। परिवार के सदस्यों ने प्रसाद एवं भोजन ग्रहण किया। इसी के साथ तीन दिवसीय जितिया पर्व का समापन हुआ।








