ओला–उबर–रैपिडो ड्राइवर हड़ताल पर, आखिर क्यों खुद को बता रहे शोषण का शिकार?

कमीशन, जीएसटी और तय किराए से परेशान ड्राइवरों की मांग—सरकार तय करे न्यूनतम भाड़ा

पटना। देश के मेट्रो शहरों से लेकर टियर-2 और टियर-3 शहरों तक आज आम लोग परिवहन के लिए बड़े पैमाने पर ओला, उबर और रैपिडो जैसे ऐप आधारित प्लेटफॉर्म पर निर्भर हो चुके हैं। कैब हो या बाइक टैक्सी, मोबाइल ऐप के जरिए सफर अब रोजमर्रा की जरूरत बन गया है। लेकिन इसी व्यवस्था को चलाने वाले ड्राइवर आज हड़ताल पर हैं, जिससे यात्रियों के मन में सवाल उठ रहा है—आखिर ड्राइवरों की परेशानी क्या है?

कैसे हो रहा है ड्राइवरों का शोषण?

ड्राइवरों का कहना है कि एग्रीगेटर कंपनियां राइड उपलब्ध कराने के बदले 20 से 30 प्रतिशत तक कमीशन काट लेती हैं। इसके अलावा जीएसटी की कटौती भी होती है। नतीजा यह कि कुल किराए का बड़ा हिस्सा कंपनी के पास चला जाता है, जबकि ड्राइवर को बहुत कम राशि मिलती है।

ड्राइवर यह भी बताते हैं कि किराया तय करने का अधिकार पूरी तरह कंपनियों के पास है। ड्राइवर न तो न्यूनतम भाड़ा तय कर सकते हैं और न ही बढ़ती लागत—जैसे पेट्रोल, वाहन मेंटनेंस और बीमा—को किराए में जोड़ सकते हैं। ऐसे में उनकी आमदनी लगातार घटती जा रही है

एक राइड में पैसे का गणित

अगर किसी राइड का किराया 200 रुपये तय होता है, तो कंपनी कमीशन और टैक्स काटने के बाद ड्राइवर को 120 से 150 रुपये ही मिलते हैं। इसी राशि से ड्राइवर को ईंधन, वाहन मरम्मत और अपने परिवार का खर्च निकालना पड़ता है। ट्रैफिक जाम के कारण समय बढ़ने पर किराया बढ़ भी जाए, तो उसका बड़ा लाभ ड्राइवर को नहीं मिल पाता।

ड्राइवरों की प्रमुख मांगें

ड्राइवरों की मांग है कि:

  • न्यूनतम बेस किराया सरकार तय करे, ताकि कंपनियां मनमानी न कर सकें।
  • कंपनियों के अधिकतम कमीशन की सीमा निर्धारित हो।
  • ज्यादा डिमांड के समय बढ़े किराए का लाभ ड्राइवरों को भी मिले।
  • व्हीकल एग्रीगेटर गाइडलाइंस 2025 को पूरी तरह लागू किया जाए।
  • टैक्सी सेवाओं में निजी गाड़ियों के इस्तेमाल पर स्पष्ट नीति बने।

ड्राइवरों ने अपनी मांगों को लेकर , केंद्रीय परिवहन मंत्री को पत्र भी लिखा है। उनका कहना है कि अगर समय रहते नियम नहीं बदले गए, तो लाखों ड्राइवरों की आजीविका पर संकट और गहरा जाएगा।

ड्राइवरों की हड़ताल ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जिस ऐप आधारित व्यवस्था ने यात्रियों की जिंदगी आसान बनाई, क्या वही व्यवस्था ड्राइवरों के लिए आर्थिक बोझ और असमानता का कारण बनती जा रही है? अब निगाहें सरकार और नीति निर्माताओं के फैसले पर टिकी हैं।

रिपोर्ट: दैनिक बिहार पत्रिका, पटना 

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