पटना। बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव भले न हुआ हो, लेकिन सत्ता के चेहरे में ऐतिहासिक परिवर्तन जरूर दर्ज हुआ है। एनडीए सरकार बरकरार है, मगर अब पहली बार राज्य की कमान भाजपा नेता के हाथों में आई है। इससे पहले मुख्यमंत्री की कुर्सी पर जदयू के नेता काबिज रहे थे।
मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही सम्राट चौधरी के सामने सबसे बड़ा सवाल वही पुराना खड़ा हो गया है—क्या अब बिहार में शराबबंदी कानून में बदलाव होगा?
दरअसल, अपने पूर्व बयानों में सम्राट चौधरी कई बार कह चुके हैं कि शराबबंदी की वजह से बिहार को हर साल करीब ₹30,000 करोड़ के राजस्व का नुकसान हो रहा है। ऐसे में उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद इस मुद्दे ने फिर से सियासी तापमान बढ़ा दिया है।
हालांकि, फिलहाल सरकार ने इस पर कोई ठोस संकेत नहीं दिया है। भाजपा के वरिष्ठ नेता पहले ही शराबबंदी को “अटल” बता चुके हैं और नई सरकार भी शुरुआती दौर में कानून-व्यवस्था व प्रशासनिक स्थिरता पर फोकस करती दिख रही है।
गौरतलब है कि बिहार में 2016 से लागू शराबबंदी कानून की सबसे बड़ी और चर्चित पहल रही है। ऐसे में इसमें किसी भी तरह का बदलाव राजनीतिक और सामाजिक तौर पर बड़ा फैसला माना जाएगा।
सूत्रों की मानें तो सरकार सीधे शराबबंदी खत्म करने के बजाय इसके नियमों में आंशिक बदलाव या क्रियान्वयन के तरीके को आसान बनाने पर विचार कर सकती है। फिलहाल, पूरे राज्य की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि भाजपा के नेतृत्व में सरकार इस संवेदनशील मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है।
रिपोर्ट: दैनिक बिहार पत्रिका, पटना
Author: दैनिक बिहार पत्रिका
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