
1932 में हरि किशोर प्रसाद ने रखी थी पक्के मंदिर की नींव, बंगला पद्धति से होती है पूजा-अर्चना; डलिया प्रसाद और दंडवत परिक्रमा की विशेष मान्यता
रिपोर्ट:- उमाकांत पोद्दार।
चांदन/बांका:- चांदन प्रखंड मुख्यालय के पांडेय टोला स्थित श्री श्री 108 सिद्धपीठ दुर्गा मंदिर में शारदीय नवरात्र की अष्टमी पर मां दुर्गा के आठवें स्वरूप मां महागौरी की पूजा-अर्चना के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। सुबह मंदिर का कपाट खुलते ही महिला और पुरुष श्रद्धालु दर्शन-पूजन के लिए पहुंचने लगे। महिलाओं ने डलिया प्रसाद चढ़ाकर परिवार की सुख-समृद्धि, शांति और खुशहाली की कामना की, जबकि कई श्रद्धालु दंडवत परिक्रमा करते हुए मां के दरबार पहुंचे। वैदिक मंत्रोच्चार और मां के जयकारों से मंदिर परिसर भक्तिमय बना रहा।चांदन का यह प्राचीन श्री श्री 108 दुर्गा मंदिर अपनी धार्मिक मान्यताओं, पारंपरिक पूजा पद्धति और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण क्षेत्र में विशेष पहचान रखता है। स्थानीय परंपराओं के अनुसार, लगभग 500 वर्ष पुराने इस मंदिर की स्थापना जमींदार स्वर्गीय उदित नारायण टिकैत ने कराई थी। मंदिर के पुराने स्वरूप से लेकर वर्तमान पूजा परंपरा तक का इतिहास कई रोचक घटनाओं और बदलावों से जुड़ा बताया जाता है।
जमींदार स्व. उदित नारायण टिकैत ने कराई थी स्थापना
स्थानीय लोगों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, जमींदार स्वर्गीय उदित नारायण टिकैत ने संतान प्राप्ति की कामना से इस दुर्गा मंदिर की स्थापना कराई थी। उस समय मंदिर खपड़ैल का हुआ करता था। धीरे-धीरे यहां पूजा-अर्चना की परंपरा विकसित हुई और यह स्थान श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया।
1932 में रखी गई पक्के मंदिर की नींव
स्थानीय स्तर पर प्रचलित जानकारी के मुताबिक, जमींदार उदित नारायण टिकैत के वंशजों के गुजर जाने के बाद भागलपुर के प्रथम एमएलसी हरि किशोर प्रसाद ने वर्ष 1932 में मंदिर के पक्के निर्माण की नींव रखी। इसके बाद मंदिर के स्वरूप में बदलाव आया और पूजा-अर्चना की परंपरा आगे बढ़ती रही। खपड़ैल के पुराने मंदिर से शुरू हुई यह धार्मिक परंपरा आज भी चांदन क्षेत्र के लोगों की आस्था से जुड़ी हुई है।
नरबलि से पाठा बलि तक बदली परंपरा
मंदिर के इतिहास से जुड़ी स्थानीय जानकारी के अनुसार, पुराने समय में यहां नरबलि की प्रथा प्रचलित थी। बताया जाता है कि वर्ष 1932 के बाद नरबलि के स्थान पर भैंसे की बलि दी जाने लगी। बाद में स्वर्गीय तारिणी तिवारी ने भैंसा बलि की प्रथा पर प्रतिबंध लगवा दिया, जिसके बाद से यहां पाठा बलि की परंपरा शुरू हुई।
बंगला पद्धति से होती है पूजा-अर्चना
श्री श्री 108 सिद्धपीठ दुर्गा मंदिर की प्रमुख विशेषताओं में बंगला पद्धति से पूजा-अर्चना शामिल है। अष्टमी के अवसर पर आचार्य लालमोहन पांडेय द्वारा बंगला पद्धति के अनुसार वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पूजन-अनुष्ठान कराया गया। वहीं, उपेंद्र पांडेय सहित अन्य सहयोगियों ने धार्मिक अनुष्ठान में भूमिका निभाई। मंदिर में प्रचलित पूजा पद्धति और पारंपरिक रीति-रिवाज इसे क्षेत्र के अन्य पूजा स्थलों से अलग पहचान देते हैं।
डलिया प्रसाद और दंडवत परिक्रमा की विशेष मान्यता
अष्टमी पर महिलाओं द्वारा डलिया प्रसाद चढ़ाने की परंपरा का विशेष महत्व है। श्रद्धालु मां के दरबार में डलिया अर्पित कर अपने परिवार की सुख-समृद्धि, संतान के कल्याण और घर में शांति बनाए रखने की प्रार्थना करते हैं। वहीं, दंडवत परिक्रमा को मां के प्रति पूर्ण समर्पण और अटूट आस्था का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालु अपनी मनोकामना की पूर्ति और परिवार की खुशहाली की कामना लेकर मंदिर पहुंचते हैं।
चांदन के अलावा बियाही, झझवा-कुरुमटांड और सुईया सहित प्रखंड के विभिन्न दुर्गा मंदिरों में भी अष्टमी पूजा को लेकर उत्साह देखने को मिला। सुबह से ही मंदिरों में श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला जारी रहा।
विक्रम दुबे की अध्यक्षता में पूजा आयोजन
चांदन बाजार की पूजा समिति की ओर से सिद्धपीठ दुर्गा मंदिर में पूजा-अर्चना और धार्मिक आयोजन की व्यवस्था की जा रही है। समिति के अध्यक्ष विक्रम दुबे और सचिव अशोक शर्मा के साथ नवल रामानी, नीरज सिंह, मंटू रामानी, पंकज पांडेय सहित अन्य सहयोगी आयोजन को सफल बनाने में सक्रिय हैं। समिति के सदस्यों की देखरेख में पूजा-अनुष्ठान और श्रद्धालुओं की सुविधा से जुड़ी व्यवस्थाएं की जा रही हैं।


CHANDAN NEWS: अष्टमी पर मां




