भागलपुर । स्टेशन के सामने की सड़क एक बार फिर अतिक्रमण की चपेट में आ गई है। हाल ही में जिला प्रशासन, पुलिस प्रशासन और नगर निगम की संयुक्त टीम ने सख्त अभियान चलाकर सड़क को अतिक्रमण मुक्त कराया था, जिससे यातायात में काफी सुधार देखा गया था। लेकिन कुछ ही हफ्तों में स्थिति फिर से वैसी ही हो गई है। ठेले, खोमचे, टेंपो, टोटो, गन्ने के रस और फल बेचने वाले दुकानदारों ने दोबारा कब्जा जमा लिया है, जिससे यात्रियों और स्थानीय लोगों को भारी जाम और असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।
प्रशासन की कार्रवाई – सिर्फ दिखावा?
प्रशासन दावा करता है कि अतिक्रमण हटाने के लिए लगातार अभियान चलाए जा रहे हैं और जुर्माना भी वसूला जा रहा है। नगर निगम के अतिक्रमण प्रभारी वशिष्ठ नारायण ने कहा, “अभियान लगातार जारी है और अतिक्रमण करने वालों पर सख्त कार्रवाई की जा रही है।”
लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ सड़कों को खाली कराना ही समस्या का स्थायी समाधान है? जब कोई वैकल्पिक व्यवस्था ही उपलब्ध नहीं कराई जाती, तो ये गरीब दुकानदार जाएं तो जाएं कहां?
गरीबों पर ही क्यों गिरी प्रशासन की गाज?
हर बार यही देखने को मिलता है कि अतिक्रमण हटाने के नाम पर सबसे पहले गरीबों पर ही कार्रवाई होती है। ये वही लोग हैं जो रोज कमाकर अपना और अपने परिवार का पेट पालते हैं। बड़े-बड़े व्यवसायिक प्रतिष्ठान, जो अवैध रूप से सरकारी जमीन पर कब्जा जमाए बैठे हैं, उनके खिलाफ ऐसी सख्ती क्यों नहीं दिखाई जाती? क्या गरीब होना ही इनका सबसे बड़ा ‘अपराध’ है?
प्रशासन के लिए सवाल:
1. गरीबों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं?
जब प्रशासन अतिक्रमण हटाता है, तो क्या उसकी जिम्मेदारी नहीं बनती कि इन लोगों को एक वैकल्पिक बाजार या रेहड़ी-पटरी जोन मुहैया कराए?
2. क्या सिर्फ गरीबों पर ही सख्ती होगी?
क्या बड़े दुकानदारों और रसूखदारों पर भी इसी तरह की कार्रवाई होती है?
3. क्या यही है विकास का मतलब?
क्या विकास और सौंदर्यीकरण के नाम पर गरीबों की आजीविका छीनना ही प्रशासनिक सफलता है?
समाधान की राह:
स्थायी बाजार स्थल: नगर निगम को चाहिए कि इन छोटे दुकानदारों के लिए उचित स्थान चिन्हित करे जहां वे बिना किसी डर के अपना रोजगार चला सकें।
पुनर्वास योजना: प्रशासन को ऐसे लोगों के लिए पुनर्वास योजना बनानी चाहिए ताकि सड़कें खाली रहें और लोगों का रोजगार भी प्रभावित न हो।
नियमित निगरानी: सिर्फ अभियान चलाकर फाइलें बंद करने से कुछ नहीं होगा। नियमित निगरानी और एक प्रभावी नीति जरूरी है।
आखिर कब मिलेगा इन गरीबों को उनका हक?
प्रशासन और सरकार को यह समझने की जरूरत है कि सड़क पर ठेला लगाने वाला हर शख्स एक मेहनतकश है, न कि कोई अपराधी। जब तक उनके लिए एक स्थायी समाधान नहीं निकाला जाएगा, तब तक यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहेगा – कभी अतिक्रमण हटाओ, कभी दोबारा बसाओ।
यह समय है जब न सिर्फ अतिक्रमण हटाने की बात की जाए, बल्कि उन लोगों के हक की भी बात की जाए जिनकी जिंदगी सड़कों पर चलती है। प्रशासन को अब जवाब देना होगा – “क्या गरीब होना गुनाह है?”
रिपोर्ट: कृष्णा टेकरीवाल, दैनिक बिहार पत्रिका
Author: दैनिक बिहार पत्रिका
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