रिपोर्ट: नैयर आलम। दैनिक बिहार पत्रिका
बेलदौर/खगड़िया। मोहर्रम इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना होता है और इसी से मुस्लिम समुदाय का नया साल शुरू होता है। लेकिन यह महीना खुशी नहीं, बल्कि गम और कुर्बानी की याद दिलाता है। मोहर्रम के महीने में हजरत मोहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों की करबला में दी गई शहादत की याद में मुस्लिम समाज ताजिया और जुलूस निकालकर शहीदों को श्रद्धांजलि देता है।
जामा मस्जिद के मौलाना इरफान रजा और मौलाना बदरुज्जमा सिद्दीकी के अनुसार, मोहर्रम की 10 तारीख को ‘रोज-ए-आशूरा’ कहा जाता है, इसी दिन करबला की वह ऐतिहासिक घटना घटी थी, जिसने इस्लाम के इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया। यह लड़ाई इराक के करबला में इमाम हुसैन और यजीद की फौज के बीच हुई थी।
हजरत मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन ने इस्लामिक सिद्धांतों से समझौता न करते हुए यजीद की सत्ता को नकार दिया। यजीद एक क्रूर शासक था, जो खुद को इस्लामी शासक कहलाना चाहता था, लेकिन उसके आचरण में इस्लामी मूल्यों का कोई स्थान नहीं था। इमाम हुसैन ने अन्याय के आगे झुकने की बजाय मदीना छोड़कर अपने परिवार और अनुयायियों के साथ करबला की ओर रुख किया।
करबला पहुंचने पर यजीद की फौज ने उनके काफिले को घेर लिया और पानी तक बंद कर दिया गया। भीषण गर्मी, प्यास और भूख के बावजूद इमाम हुसैन ने अन्याय के सामने सिर नहीं झुकाया। सात से दस मोहर्रम तक इमाम हुसैन और उनके परिजन भूखे-प्यासे रहे। 10 मोहर्रम को एक-एक करके उनके साथी शहीद होते गए और अंततः असर (दोपहर) की नमाज़ के बाद इमाम हुसैन खुद शहीद हुए।
इस जंग में इमाम का बेटा जैनुल आबेदीन ही जीवित बचा, क्योंकि वह बीमार थे। बाद में उन्हीं से हजरत मोहम्मद की नस्ल आगे चली। इमाम हुसैन की शहादत इस्लाम की रक्षा के लिए दी गई सबसे बड़ी कुर्बानी मानी जाती है।
शहादत के बाद यजीद ने महिलाओं और बच्चों को कैद कर लिया। उन्हें यातनाएं दी गईं और हुसैन की मासूम बेटी सकीना की मौत कैद में ही हो गई।
मोहर्रम का महीना आज भी हमें यह सिखाता है कि सच्चाई और इंसाफ के लिए कितनी भी बड़ी कुर्बानी क्यों न देनी पड़े, कभी झुकना नहीं चाहिए। यही कारण है कि हर साल मोहर्रम में मुस्लिम समाज ताजिया, मातम और जुलूस के जरिए करबला के शहीदों को याद करता है।
Author: दैनिक बिहार पत्रिका
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