आरोप सिद्ध होने के बावजूद हल्का कर्मचारी पर कार्रवाई नहीं, प्रशासन की भूमिका पर उठे सवाल

जमाबंदी में छेड़छाड़ का मामला, एक पंचायत से हटाकर कई पंचायतों का प्रभार—एफआईआर अब तक नहीं

सुपौल — जिले के त्रिवेणीगंज अंचल में अवैध तरीके से जमाबंदी में छेड़छाड़ के गंभीर मामलों में आरोप सिद्ध होने के बावजूद हल्का/राजस्व कर्मचारी राज रोशन पर अब तक कोई कठोर कार्रवाई नहीं होने से प्रशासनिक भूमिका पर सवाल खड़े हो गए हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि कार्रवाई के नाम पर सिर्फ दिखावा किया गया—एक पंचायत से मुक्त कर देने के बाद आरोपी कर्मचारी को कई अन्य पंचायतों का प्रभार सौंप दिया गया।

मामला मानगंज पश्चिम पंचायत से जुड़ा है, जहां पदस्थापित रहते हुए राज रोशन पर मोटी रकम लेकर पंजी-2 से छेड़छाड़ करने के आरोप सामने आए। दस्तावेजों के अनुसार मौजा मानगंज की जमाबंदी संख्या 2142 (खाता 625, खेसरा 2460—9 कट्ठा), खाता 627 (खेसरा 2509 एवं 2522—कुल 9 कट्ठा) सहित कुल 18 कट्ठा भूमि डोमी साह एवं रघुनंदन शाह के नाम दर्ज थी। आरोप है कि इस भूमि का रकबा परिमार्जन कर गलत खेसरा (2522) में 18 कट्ठा चढ़ा दिया गया।

इस गड़बड़ी को 17 जनवरी 2026 को प्रमुखता से उजागर किए जाने के बाद अंचलाधिकारी ने त्वरित सुधार करते हुए खेसरा 2522 में साढ़े चार कट्ठा दर्ज किया और आरोपी कर्मचारी को उक्त पंचायत से हटा दिया। लेकिन जांच आगे बढ़ने पर सामने आया कि जमाबंदी संख्या 2636, 2639 और 2510 में भी रकबा घटाने-बढ़ाने जैसी छेड़छाड़ की गई है—जबकि पंजी-2 में अलग-अलग खाता-खेसरा व रकबा अंकित है।

प्रकरण पर , अपर समाहर्ता, सुपौल ने संज्ञान लेते हुए डीसीएलआर संस्कार रंजन और अंचलाधिकारी प्रियंका सिंह को तत्काल आरोपी कर्मचारी को पंचायत से हटाने तथा उसके विरुद्ध कार्रवाई का प्रस्ताव भेजने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद करीब 21 दिन बीत जाने के बाद भी न तो सख्त विभागीय कार्रवाई हुई और न ही एफआईआर दर्ज की गई।

प्रशासनिक पक्ष में यह बताया गया है कि आरोप-पत्र गठित कर अनुमंडल पदाधिकारी को भेज दिया गया है, लेकिन यह कहां अटका है—यह जांच का विषय बना हुआ है। सवाल यह भी है कि आरोप सिद्ध होने के बाद भी राज रोशन को अन्य पंचायतों का प्रभार किस उद्देश्य से दिया गया?

स्थानीय लोगों का कहना है कि दोषी पर कार्रवाई न होना नियमों का उल्लंघन है और इससे न्याय व्यवस्था पर भरोसा कमजोर होता है। अब निगाहें सुपौल प्रशासन पर हैं—क्या आरोप सिद्ध होने के बाद भी कार्रवाई टलती रहेगी, या जिम्मेदारों पर कानून के मुताबिक कदम उठेंगे?

रिपोर्ट: पप्पू आलम, दैनिक बिहार पत्रिका 

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