*आजादी के बाद करीब चार दशक तक बिहार की राजनीति में दबदबा कायम रखने वाली कांग्रेस के सामने अस्तित्व बचाने की चुनौती, नेतृत्व से लेकर संगठन और चुनावी रणनीति तक पर उठ रहे सवाल*
बिहार की राजनीति में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का इतिहास कभी गौरवशाली रहा है। आजादी के बाद लंबे समय तक राज्य की सत्ता पर काबिज रहने वाली पार्टी आज उसी बिहार में अपनी राजनीतिक पहचान और जनाधार बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। अक्टूबर 2026 में बिहार विधान परिषद की आठ स्नातक एवं शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की सीटों पर हुए चुनाव ने कांग्रेस की मौजूदा राजनीतिक स्थिति को एक बार फिर उजागर कर दिया है। पार्टी ने पांच सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे, लेकिन किसी भी सीट पर जीत हासिल नहीं कर सकी। सबसे बड़ा झटका तब लगा, जब कांग्रेस अपनी परंपरागत दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की सीट भी गंवा बैठी। यहां जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार डॉ. सुरेश प्रसाद राय ने कांग्रेस के निवर्तमान एमएलसी डॉ. मदन मोहन झा को पराजित कर दिया।
इस चुनाव में कांग्रेस और उसकी प्रमुख सहयोगी राष्ट्रीय जनता दल के बीच सीटों को लेकर बेहतर तालमेल नहीं बन पाना भी चर्चा का विषय रहा। तीन स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में दोनों दलों के प्रत्याशी आमने-सामने चुनाव मैदान में उतरे। गठबंधन के भीतर इस तरह की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा विपक्षी एकजुटता और साझा चुनावी रणनीति पर सवाल खड़े करती है। सवाल यह भी है कि जब दोनों दल एक ही राजनीतिक खेमे में हैं, तो चुनावी तालमेल बनाने में आखिर परेशानी क्यों होती है?
*कभी बिहार की राजनीति में कांग्रेस का था एकछत्र प्रभाव*
इतिहास के पन्नों पर नजर डालें तो 1947 के बाद बिहार की राजनीति में कांग्रेस का मजबूत प्रभाव रहा। डॉ. श्रीकृष्ण सिंह यानी श्रीबाबू ने लगभग 15 वर्षों तक मुख्यमंत्री के रूप में राज्य का नेतृत्व किया। 1967 में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनने के बाद राजनीतिक अस्थिरता का दौर शुरू हुआ, लेकिन कांग्रेस अलग-अलग समय पर सत्ता में वापसी करती रही। 1980 के दशक में भी जगन्नाथ मिश्रा, चंद्रशेखर सिंह, बिंदेश्वरी दूबे और भागवत झा आजाद जैसे नेताओं ने राज्य की कमान संभाली। मार्च 1990 में कांग्रेस की सत्ता से विदाई के बाद बिहार की राजनीति में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव तेजी से बढ़ा। लालू प्रसाद यादव के उदय के साथ सामाजिक और जातीय समीकरणों पर आधारित राजनीति ने नई दिशा ले ली।
*आखिर कहां कमजोर पड़ गई कांग्रेस?*
कांग्रेस की लगातार कमजोर होती राजनीतिक स्थिति के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण दिखाई देते हैं। सबसे बड़ी समस्या मजबूत स्थानीय नेतृत्व का अभाव है। पार्टी के पास ऐसे जनाधार वाले नेताओं की कमी महसूस की जा रही है, जो गांव, पंचायत और प्रखंड स्तर तक कार्यकर्ताओं को एकजुट कर सकें। दूसरी ओर, संगठनात्मक कमजोरी, आंतरिक गुटबाजी और बूथ स्तर पर कमजोर पकड़ भी चुनावी परिणामों को प्रभावित कर रही है।
क्षेत्रीय दलों के उभार ने कांग्रेस के पारंपरिक सामाजिक जनाधार को भी काफी हद तक प्रभावित किया है। बिहार में राजद और जदयू जैसे दलों ने अपनी अलग राजनीतिक पहचान और मजबूत सामाजिक समीकरण तैयार किए हैं। ऐसे में कांग्रेस कई बार गठबंधन में जूनियर पार्टनर की भूमिका तक सीमित दिखाई देती है।
इसके अतिरिक्त भाजपा की मजबूत चुनावी रणनीति, बूथ प्रबंधन और लगातार जनता के बीच सक्रिय रहने की कार्यशैली के मुकाबले कांग्रेस को भी अपनी राजनीतिक रणनीति में बदलाव लाने की जरूरत है। केवल सरकार और विरोधी दलों की आलोचना करने से जनता का भरोसा हासिल नहीं किया जा सकता। इसके लिए रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई, किसानों और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर स्पष्ट और भरोसेमंद विकल्प प्रस्तुत करना होगा।
*सवाल सिर्फ चुनाव हारने का नहीं, राजनीतिक अस्तित्व का है।*
कांग्रेस के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती अपनी ऐतिहासिक विरासत को वर्तमान की राजनीतिक जरूरतों से जोड़ने की है। पार्टी को मजबूत प्रदेश नेतृत्व, सक्रिय कार्यकर्ता, आंतरिक एकजुटता और स्पष्ट जनहितकारी एजेंडे के साथ मैदान में उतरना होगा। अन्यथा बिहार की राजनीति में कभी सत्ता की धुरी रही कांग्रेस की पहचान केवल गठबंधन की एक सहयोगी पार्टी बनकर रह जाने का खतरा है।
अब देखना होगा कि कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व बिहार में संगठन को नई ऊर्जा देने के लिए क्या ठोस कदम उठाता है।
दैनिक बिहार पत्रिका गुरुदेव कुमार।





