अधूरी रह गई आस — 10 करोड़ की योजना भी नहीं बुझा सकी बौंसी की प्यास

तीन दशक से जारी जल संकट से जूझ रहे बौंसीवासी, पाइपलाइन बिछी पर नलों में पानी अब भी नदारद

बौंसी/बांका — पर्यटन स्थल मंदार की गोद में बसा ऐतिहासिक नगर बौंसी, जहां हर साल हजारों सैलानी आते हैं, आज भी पानी की बूंद-बूंद के लिए तरस रहा है। तीन दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यहां की सबसे बड़ी समस्या — ‘पानी की प्यास’ बनी हुई है। करोड़ों रुपये की योजनाएं बनीं, उद्घाटन हुए, लेकिन बौंसी की गलियों में आज भी नलों से पानी नहीं बह रहा।

नगर पंचायत और पीएचईडी विभाग की लापरवाही के कारण डैम रोड, थाना कॉलोनी, दलिया और पंडा टोला जैसे इलाके रोज़ पानी की किल्लत झेल रहे हैं। करीब 50 हजार की आबादी आज भी हर दिन प्यास से जूझ रही है। 10 करोड़ रुपये की लागत से बनी ‘सुखनियां पेयजलापूर्ति योजना’ भी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई। पाइपलाइन जरूर बिछी, लेकिन नलों में पानी अब तक गायब है।

लोगों का कहना है कि अब चुनाव में बात सिर्फ़ वादों की नहीं, पानी की होगी। जनता पूछ रही है — “कब बुझेगी शहर की प्यास?”
जब नगर परिषद ने इस योजना की शुरुआत की थी, तब बौंसी के लोगों की आंखों में एक नई उम्मीद जगी थी — कि अब जीवन आसान होगा और नलों में पानी बहेगा। लेकिन वक्त गुज़रता गया, और हर वादा सूखती धरती की तरह बंजर साबित हुआ।

अब बौंसी की जनता का एक ही संदेश है — “हमें भाषण नहीं, पानी चाहिए।” नलों में पानी नहीं है, लेकिन आंखों में उम्मीद अब भी बाकी है — कि कभी तो बौंसी की प्यास बुझेगी।

रिपोर्ट: कुमार चंदन, दैनिक बिहार पत्रिका 

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