“भाई-बहन के स्नेह में डूबा बौंसी — हर्षोल्लास के साथ मनाया गया भाई दूज का पर्व”,“परंपरा नहीं, वेदों से निकला संबंध: भाई दूज का अद्भुत विधान”

बौंसी/बांका : बौंसी प्रखंड में गुरुवार को भाई-बहन के प्यार से सराबोर रहा… भाई दूज का पावन पर्व पूरे उत्साह और पारंपरिक रीति से मनाया गया। सुबह से ही बहनें सजधज कर तैयार — थाल में आरती, दीप और मिठाइयाँ… अपने भाई के माथे पर तिलक लगाकर दीर्घायु की कामना करती नज़र आईं। भाइयों ने भी अपनी बहनों के चरण छूकर लिया आशीर्वाद, और प्यार भरे उपहारों से इस रिश्ते को किया और भी खास। हर घर में गूँजती रही हँसी और मिठाइयों की मिठास ने बढ़ाई रौनक। भाई-बहन के स्नेह और अपनापन से आज बौंसी का हर कोना खिल उठा। ये सिर्फ एक पर्व नहीं… ये उस रिश्ते की कहानी है, जहाँ प्यार हर बार जीत जाता है।

भाई दूज, जिसे यम द्वितीया भी कहा जाता है, दीपावली के पांचवें और अंतिम दिन मनाया जाता है। यह त्योहार भाई-बहन के प्रेम, त्याग और समर्पण का प्रतीक है, जिसमें भाई बहन की रक्षा का वचन देता है। ऋग्वेद और पुराणों में इस पर्व का उल्लेख मिलता है, जो इसे दीपावली का सबसे प्राचीन और प्रामाणिक पर्व बनाता है।

दीपावली की पर्व शृंखला में पांचवा और आखिर दिन भाई दूज के नाम से मनाया जाता है। असल में इसका शास्त्रीय नाम यम द्वितीया है। द्वितीया की यह तिथि भी यम को ही समर्पित है। पांच पर्वों में भाई दूज अकेला ऐसा त्योहार है जिसका स्पष्ट जिक्र वेदों में आता है और इस तरह यह दीपावली के दौरान मनाया जाने वाला सबसे प्राचीन और सबसे ज्यादा ऑथेंटिक (प्रामाणिक) पर्व है, जो अपने असली स्वरूप और असली कारण के साथ है। इसमें न समय के साथ कोई बदलाव आया है और न ही इसका उद्देश्य बदला है।

भाई-बहन के बीच प्रेम-त्याग और समर्पण का यही असली त्योहार है, जहां भाई अपनी बहन को उसके शील की रक्षा का वचन देता है। बहनें भाई को आमंत्रित करती हैं, भाई को तिलक करके उनके मंगल जीवन की कामना करती हैं और उन्हें भोजन कराती हैं। भाई दूज सिर्फ एक परंपरा नहीं… इसका ज़िक्र ऋग्वेद के दशम मंडल में मिलता है — संवाद सूक्त में यम और उनकी बहन यमुना (यमी) के संवाद के रूप में। यही वह प्रसंग है जहाँ पहली बार भाई और बहन के रिश्ते की मर्यादा, प्रेम और आदर्शों का चित्रण किया गया।

इसी से निकला — यम द्वितीया का विधान, जो आज “भाई दूज” के रूप में मनाया जाता है। आज भी बहनें अपने भाई की लंबी उम्र और सुख की कामना करती हैं, और भाई जीवनभर उनकी रक्षा का वचन देते हैं। पौराणिक ग्रंथों से लेकर आज की परंपराओं तक — भाई दूज वो डोर है, जो रिश्तों में विश्वास और स्नेह की मिसाल कायम रखती है।

रिपोर्ट: कुमार चंदन, दैनिक बिहार पत्रिका 

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