खगड़िया। जिले के गोगरी अनुमंडल मुख्यालय स्थित केडीएस कॉलेज में बुनियादी सुविधाओं का भारी अभाव है। कॉलेज प्रशासन की लापरवाही और मनमानी के कारण विद्यार्थियों को हर दिन अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कॉलेज परिसर में 22 वर्षों से अधूरा पड़ा छात्रावास आज भूतहा खंडहर में तब्दील हो चुका है। चारों तरफ उगी झाड़ियां और जंगली खरपतवार इस भवन को पूरी तरह ढक चुकी हैं। छात्रों के मुताबिक, इसके अंदर जाने में उन्हें डर लगता है क्योंकि वहां किसी खतरनाक जानवर के होने की आशंका है। बताया जाता है कि छात्रावास के निर्माण के लिए वर्ष 2002 में विश्वविद्यालय सेवा आयोग ने 27 लाख रुपये की राशि स्वीकृत की थी। इसमें से 25.35 लाख रुपये खर्च किए गए और शेष राशि ब्याज सहित वापस कर दी गई। ठेकेदार की हत्या के बाद निर्माण कार्य अधर में लटक गया और अब इसकी मरम्मत या निर्माण की कोई संभावना नहीं दिख रही है।
दूर-दराज से पढ़ने आने वाले छात्र-छात्राएं अब महंगे किराये पर कमरा लेकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं। वहीं, कॉलेज में पेयजल की व्यवस्था भी बेहद खराब है। दो चापाकलों में से एक पूरी तरह से खराब पड़ा है और दूसरा ठीक से पानी नहीं देता। जब कभी यह चापाकल भी खराब होता है तो महीनों तक उसकी मरम्मत नहीं होती। कॉलेज की चारदीवारी भी कई स्थानों पर इतनी नीची है कि चोर आसानी से परिसर में प्रवेश कर जाते हैं और चोरी की घटनाओं को अंजाम देते हैं।
कॉलेज पुस्तकालय की स्थिति भी दयनीय है। जर्जर भवन में संचालित लाइब्रेरी अब नाममात्र की रह गई है। कई क्लासरूम भी खस्ताहाल हैं और छात्रों की जान जोखिम में डालकर वहीं पढ़ाई कराई जा रही है। कॉलेज परिसर में घास-झाड़ियां और कचरे का अंबार देखने को मिलता है। केवल किसी बड़े खेल टूर्नामेंट या सरकारी कार्यक्रम के वक्त ही साफ-सफाई करवाई जाती है, बाकी दिनों में परिसर जंगल जैसा नजर आता है।
कॉलेज से यदि किसी छात्र को मेडिकल, इंजीनियरिंग या अन्य किसी फील्ड में दाखिले के लिए SLC (स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट) चाहिए होता है, तो उसे 10 से 15 दिनों तक चक्कर लगाने पड़ते हैं। कई बार तो छात्रों की प्रवेश तिथि ही निकल जाती है और उनका साल बर्बाद हो जाता है। स्कॉलरशिप फॉर्म भरने के नाम पर भी छात्रों से तय दर से अधिक पैसा लिया जाता है और कॉलेज कर्मी उन्हें एक विशेष साइबर कैफे में फॉर्म भरवाने भेजते हैं।
कॉलेज के शिक्षकों और अधिकारियों का रवैया भी बेहद लापरवाह है। अधिकतर शिक्षक और प्राचार्य निर्धारित समय से एक से डेढ़ घंटे देर से कॉलेज आते हैं। केवल कुछ ही प्रोफेसर अपने कर्तव्यों के प्रति ईमानदार हैं। दूसरी ओर, समय पर पहुंचने वाले प्राइवेट स्टाफ को समय से वेतन नहीं मिलता, जिससे तंग आकर कई कर्मचारियों ने नौकरी छोड़ दी है।
एडमिशन के वक्त कॉलेज के बाहर लंबी कतारें लगती हैं। छात्र-छात्राओं को 5 से 6 घंटे तक खड़ा रहना पड़ता है, जिससे कई बार वे गर्मी में बेहोश तक हो जाते हैं। कॉलेज प्रशासन इन हालात में भी कोई राहत या वैकल्पिक व्यवस्था नहीं करता। वहीं, बारिश होते ही कॉलेज के रास्तों में जलजमाव हो जाता है, जिससे छात्रों को कीचड़ से होकर गुजरना पड़ता है।
कॉलेज में अधिकांश सरकारी कार्यक्रम केवल खाना-पूर्ति के लिए आयोजित किए जाते हैं, ताकि विश्वविद्यालय को दिखाया जा सके कि कॉलेज में सब कुछ ठीक है। लेकिन सच्चाई यह है कि केडीएस कॉलेज में शिक्षा व्यवस्था, प्रबंधन और संसाधन—तीनों ही बुरी तरह चरमराए हुए हैं। जरूरत है कि प्रशासन जल्द से जल्द इस ओर ध्यान दे और विद्यार्थियों के भविष्य को अंधकार में जाने से रोके।
रिपोर्ट: मो. साजिद सुलेमानी, दैनिक बिहार पत्रिका
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