Banka News: आवेदन के बावजूद कार्रवाई नहीं! क्या किसी अनहोनी की कर रहे हैं प्रतीक्षा, थाना प्रभारी विपिन कुमार?

पत्रकार को जान से मारने की धमकी, लेकिन आनंदपुर पुलिस मौन… क्या मिलीभगत का है मामला?

भैरोगंज (बांका)। क्या सच्चाई उजागर करने की कीमत मौत का डर है? यह सवाल आज हर पत्रकार के मन में उठ रहा है, और इसकी वजह है — आनंदपुर थाना क्षेत्र में पदस्थापित थाना प्रभारी विपिन कुमार की संदिग्ध चुप्पी।

थाना प्रभारी विपिन कुमार

पत्रकार उमाकांत साह, जिन्होंने आंगनबाड़ी केंद्र की अनियमितताओं को उजागर किया, उन्हें जान से मारने की धमकियाँ, अश्लील गालियाँ और लगातार डराने की कोशिशें झेलनी पड़ीं। उन्होंने तीन युवकों के खिलाफ लिखित शिकायत भी थाना प्रभारी को सौंपी। लेकिन हैरानी की बात यह है कि अब तक न कोई एफआईआर दर्ज हुई, न किसी आरोपी की गिरफ्तारी।

ऐसा प्रतीत होता है कि थाना प्रभारी विपिन कुमार किसी अनहोनी की प्रतीक्षा कर रहे हैं, या फिर किसी दबाव या मिलीभगत के कारण उन्होंने कार्रवाई से हाथ पीछे खींच लिए हैं। पत्रकार उमाकांत साह ने 29 जुलाई को आंगनबाड़ी केंद्र संख्या 45, नावाडीह पर ड्रेस कोड में नहीं रहने और कम उपस्थिति जैसी अनियमितताओं की रिपोर्टिंग की थी। इसके बाद 2 अगस्त की रात उन्हें फोन पर धमकी मिली, जिसकी ठोस पहचान रूपेश कुमार, गांव दिग्घीवारी, थाना आनंदपुर के रूप में हुई। इसके साथ ही सोनू कुमार और नितीश कुमार का नाम भी सामने आया।

पीड़ित पत्रकार

फोन नंबर, पहचान और धमकी का स्पष्ट प्रमाण होने के बावजूद थाना प्रभारी की निष्क्रियता सीधे तौर पर उनकी भूमिका पर सवाल उठाती है। क्या पुलिस की नजर में पत्रकार की जान की कोई कीमत नहीं? क्या सिस्टम अब सच बोलने वालों को डराकर चुप कराना चाहता है?

पत्रकार के द्वारा दी गई आवेदन

उमाकांत साह आज खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, लेकिन पुलिस-प्रशासन उनके आवेदन को धूल फांकने को छोड़ चुका है। अगर किसी दिन इसी डर की वजह से कोई अनहोनी हो जाती है, तो उसका जिम्मेदार कौन होगा?

थाना प्रभारी विपिन कुमार पर अब सवाल उठने लगे हैं — आखिर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या आरोपियों को राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त है? क्या सच को दबाने का प्रयास हो रहा है?

दैनिक बिहार पत्रिका यह मांग करता है कि आनंदपुर थानाध्यक्ष को इस प्रकरण में तत्काल जवाबदेह बनाया जाए, पीड़ित पत्रकार को सुरक्षा प्रदान की जाए, आरोपियों के खिलाफ जल्द से जल्द प्राथमिकी दर्ज कर कड़ी कार्रवाई की जाए और थाना प्रभारी के कार्य की स्वतंत्र जांच हो ताकि मिलीभगत के आरोपों पर से पर्दा उठ सके।

अगर पत्रकारों को ही अपनी सुरक्षा के लिए संघर्ष करना पड़े, तो समाज में सच्चाई बोलने की हिम्मत कौन करेगा? अब वक्त है कि पुलिस प्रशासन अपनी चुप्पी तोड़े और कानून अपना काम करे।

ब्यूरो रिपोर्ट, दैनिक बिहार पत्रिका 

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Author: दैनिक बिहार पत्रिका

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