
मकरमाडीह में ‘मेरा रेशम मेरा अभिमान 2.0’ के तहत रीलरों का प्रशिक्षण; वर्किंग कैपिटल के लिए बैंक ऋण की मिली जानकारी, बाजार की मांग के अनुरूप उत्पादन पर जोर
रजौन/बांका:- तसर कोकून से धागा तैयार करने वाले रीलरों को पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़ाकर आधुनिक मशीन रीलिंग, बेहतर गुणवत्ता और बड़े बाजार से जोड़ने की दिशा में पहल तेज की गई है। इसी उद्देश्य से शनिवार को रजौन प्रखंड के मकरमाडीह में रीलरों के लिए विशेष कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया, जहां वैज्ञानिकों एवं अधिकारियों ने बेहतर उत्पादकता के लिए नई रीलिंग तकनीकों से लेकर बाजार और पूंजी की चुनौतियों तक पर सीधा संवाद किया। केंद्रीय रेशम बोर्ड, सीएसबी-सीटीआरटीआई, रांची एवं तसर अग्र परियोजना केंद्र इनारावरण की ओर से ‘मेरा रेशम मेरा अभिमान (MRMA) 2.0’ के तहत 12 सितंबर को आयोजित प्रशिक्षण का विषय ‘Better Techniques for Higher Productivity During Reeling’ रहा। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जिला उद्योग केंद्र, बांका के महाप्रबंधक के.के. भारती ने रीलरों से संवाद कर उनके कारोबार में कार्यशील पूंजी यानी वर्किंग कैपिटल की समस्या को समझा। रीलरों की मांग पर उन्होंने बैंकों से उपलब्ध विभिन्न प्रकार के ऋण एवं वित्तीय सहायता की जानकारी दी और इन सुविधाओं का लाभ लेकर अपने व्यवसाय का विस्तार करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि रीलिंग क्षेत्र में लगातार नई तकनीक विकसित हो रही है। ऐसे में रीलरों को आधुनिक तकनीकों की जानकारी रखते हुए उन्हें अपने काम में अपनाने की जरूरत है, ताकि उत्पादन के साथ तैयार धागे की गुणवत्ता भी बेहतर हो सके।
मशीन रीलिंग के सामने बाजार की चुनौती
सीएसबी-सीटीआरटीआई, रांची के वैज्ञानिक-बी एवं MRMA 2.0 बांका के नोडल अधिकारी आशु कुमार ने रीलरों से उनकी तकनीकी एवं व्यावसायिक समस्याओं पर चर्चा की। संवाद के दौरान एक महत्वपूर्ण चुनौती बाजार की मांग को लेकर सामने आई।
रीलरों ने बताया कि कुछ खरीदार मशीन से तैयार धागे के बजाय थाई-रील्ड (Thigh-reeled) यार्न की मांग करते हैं। इस कारण आधुनिक मशीन रीलिंग को अपनाने के बावजूद उत्पाद की बिक्री को लेकर कठिनाई उत्पन्न होती है। इस पर वैज्ञानिक आशु कुमार ने रीलरों को ऐसे बाजार और खरीदारों से संपर्क बढ़ाने की सलाह दी, जहां मशीन-रील्ड तसर यार्न की बेहतर मांग उपलब्ध हो।
तकनीक से मशीन वाले धागे को भी मिल सकती है पारंपरिक बनावट
प्रशिक्षण में देश के अन्य प्रमुख तसर उत्पादक राज्यों में अपनाई जा रही तकनीकों और प्रक्रियाओं की जानकारी भी दी गई। विशेषज्ञों के अनुसार उचित रीलिंग एवं फिनिशिंग तकनीक अपनाकर मशीन से तैयार तसर यार्न में भी थाई-रील्ड धागे जैसी बनावट एवं विशेषताएं विकसित की जा सकती हैं। इससे मशीन रीलिंग को बढ़ावा मिलने के साथ उत्पादकता, धागे की गुणवत्ता और रीलरों की आय बढ़ाने की संभावनाएं मजबूत हो सकती हैं। कार्यक्रम में रीलरों ने अपनी तकनीकी, बाजार और व्यवसाय से जुड़ी समस्याएं विशेषज्ञों के सामने रखीं और उनके समाधान की जानकारी प्राप्त की। प्रशिक्षण का उद्देश्य तसर रीलिंग को केवल उत्पादन तक सीमित न रखते हुए उसे आधुनिक, अधिक लाभकारी और बाजारोन्मुख व्यवसाय के रूप में विकसित करना रहा।









