*तेमथा राका में 100 वर्षों से अधिक पुरानी पूजा परंपरा, कन्हैयाचक में 1875 से हो रही आराधना तो तेमथा गांव में भी आजादी से पहले से स्थापित है मां काली के प्रति श्रद्धा*
खगड़िया। दीपावली और काली पूजा का पर्व नजदीक आते ही परबत्ता प्रखंड क्षेत्र में धार्मिक उत्साह और भक्ति का माहौल बनने लगा है। नगर पंचायत क्षेत्र के अंतर्गत तेमथा राका, कन्हैयाचक और तेमथा गांव में स्थित मां काली के तीन प्राचीन मंदिर अपनी अलग-अलग ऐतिहासिक पहचान, धार्मिक मान्यताओं और समृद्ध परंपराओं के लिए प्रसिद्ध हैं। इन मंदिरों में वर्षों से चली आ रही पूजा-अर्चना न केवल लोगों की अटूट आस्था का प्रतीक है, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को भी संजोए हुए है। काली पूजा के अवसर पर यहां दूर-दराज के गांवों और आसपास के जिलों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
*तेमथा राका: गंगा कटाव के बाद भी नहीं टूटी आस्था।*
तेमथा राका स्थित मां काली मंदिर का इतिहास 100 वर्षों से अधिक पुराना माना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यहां आजादी से पहले से ही मां काली की पूजा होती आ रही है। शुरुआती दौर में ग्रामीणों ने फूस का छोटा मंदिर बनाकर पूजा-अर्चना शुरू की थी। वर्ष 1978 में गंगा नदी के भीषण कटाव में पुराना मंदिर नदी में समा गया। इसके बाद ग्रामीणों ने प्रखंड मुख्यालय के समीप नए स्थान पर वर्ष 1980 में सामूहिक सहयोग से पक्के मंदिर का निर्माण कराया।
इस मंदिर परिसर में मां काली के अलावा मां भगवती, विषहरी और भगवान शिव के मंदिर भी स्थापित हैं। यहां पूजा की परंपरा कई पीढ़ियों से एक ही परिवार द्वारा निभाई जा रही है। सबसे पहले बाबा त्रिलोकी राय ने मां की सेवा की। उनके बाद पुत्र खेली राय ने वर्ष 1998 तक पूजा-अर्चना की। वर्तमान में उनके पुत्र पुजारी रंजीत कुमार मंदिर की पूजा और देखरेख की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई मुराद मां काली अवश्य पूरी करती हैं।
*कन्हैयाचक: 1875 से जारी है मां काली की आराधना।*
कन्हैयाचक गांव का मां काली मंदिर लगभग 150 वर्षों के इतिहास को अपने अंदर समेटे हुए है। स्थानीय इतिहास के अनुसार, वर्ष 1875 में हरनाथ सिंह के महत्वपूर्ण योगदान से यहां मां काली की पूजा की शुरुआत हुई थी। शुरुआती दिनों में मिट्टी और खपरैल का छोटा मंदिर हुआ करता था। समय के साथ ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ और सामूहिक सहयोग से भव्य पक्के मंदिर का निर्माण कराया गया।
इस मंदिर की एक विशेष पहचान इसकी समृद्ध नाट्य परंपरा भी है। वर्ष 1938 में मां काली नाट्य कला की स्थापना की गई थी। तब से प्रत्येक वर्ष काली पूजा के अवसर पर सामाजिक और धार्मिक नाटकों का मंचन किया जाता है। वर्ष 2022 में मंदिर के नए स्वरूप का भूमि पूजन हुआ और 5 नवंबर 2023 को लगभग 1 करोड़ 55 लाख रुपये की लागत से भव्य मंदिर बनकर तैयार हुआ। करीब 80 फीट ऊंचा यह मंदिर दक्षिणेश्वर काली मंदिर की स्थापत्य शैली से प्रेरित है। राजस्थान सहित अन्य राज्यों से मंगाए गए विशेष पत्थरों पर बंगाल के कारीगरों ने आकर्षक नक्काशी की है।
*तेमथा गांव: पीढ़ियों से कायम है श्रद्धा और विश्वास।
तेमथा गांव में भी मां काली की पूजा की परंपरा 100 वर्षों से अधिक पुरानी मानी जाती है। ग्रामीणों के अनुसार, यहां ब्रिटिश शासनकाल से ही मां की आराधना होती आ रही है। शुरुआत में ग्रामीणों ने आपसी सहयोग से फूस का मंदिर बनाकर पूजा शुरू की थी। बाद में वर्ष 1980 में मंदिर का पक्के स्वरूप में निर्माण कराया गया। यहां भी पुजारियों की पारिवारिक परंपरा रही है। बाबा त्रिलोकी राय और उनके बाद खेली राय ने मां की सेवा की। वर्ष 1998 में खेली राय के निधन के बाद उनके पुत्र रंजीत कुमार पूजा-पाठ की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
इस प्रकार परबत्ता क्षेत्र के ये तीनों काली मंदिर धार्मिक आस्था के साथ-साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के महत्वपूर्ण केंद्र बने हुए हैं। इन मंदिरों से जुड़ी पीढ़ियों पुरानी परंपराएं, ग्रामीणों का सामूहिक सहयोग और लोक संस्कृति आज भी लोगों को अपनी जड़ों से जोड़े हुए हैं। काली पूजा के अवसर पर इन मंदिरों में उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ इस बात की गवाह है कि समय बदलने के बावजूद मां काली के प्रति लोगों की आस्था और विश्वास आज भी अटूट है।
दैनिक बिहार पत्रिका परबत्ता संवाददाता गुरुदेव कुमार।


परबत्ता में तीन प्राचीन मां






