पटना/भागलपुर । बिहार की राजधानी पटना में स्थित पारस हॉस्पिटल एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन इस बार अपनी अमानवीयता और लाश पर मोलभाव करने की शर्मनाक हरकत को लेकर! यहां एक मृतक के परिजनों को उनके अपने की लाश सौंपने से पहले मोटी रकम की ‘फीस’ चुकाने का फरमान सुनाया गया। जब मामला तूल पकड़ा, तो अंततः मीडिया और स्थानीय नेताओं के दखल के बाद शव परिजनों को सौंप दिया गया। लेकिन सवाल ये उठता है—क्या लाश को भी अब खरीदा-बेचा जाएगा? क्या अस्पतालों में मरीजों की जिंदगी से ज्यादा पैसों की कीमत रह गई है?
“पहले पैसे दो, फिर लाश लो!” – पारस हॉस्पिटल का अमानवीय चेहरा
भागलपुर जिले के बिहपुर विधानसभा क्षेत्र के राघोपुर गांव के नंदकिशोर मंडल के बेटे प्रवीण कुमार ब्लड डिसऑर्डर से पीड़ित थे। बेहतर इलाज के लिए उन्हें 12 मार्च 2025 को पटना के पारस हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। वहां 13, 14, 16 और 18 मार्च को प्लाज्मा फोरेसिस किया गया, जिसके लिए 34 यूनिट प्लाज्मा, 5 यूनिट ब्लड और 4 यूनिट प्लेटलेट्स चढ़ाए गए।
लेकिन मंगलवार सुबह 3 बजे प्रवीण की मौत हो गई। परिजनों को लगा कि अब उनकी तकलीफें खत्म हो गईं, लेकिन असल मुसीबत तो अभी शुरू हुई थी!
पारस हॉस्पिटल ने शव सौंपने से इनकार कर दिया और कहा—“बिल पूरा चुकाओ, तभी लाश मिलेगी!”
लाश के लिए 7 लाख का बिल!
पारस हॉस्पिटल ने परिजनों के सामने 7,26,288 रुपये का भारी-भरकम बिल रख दिया। परिवार पहले ही 1,80,000 रुपये जमा कर चुका था, लेकिन अस्पताल प्रबंधन ने कहा कि जब तक बचे हुए 5,46,288 रुपये नहीं मिलते, तब तक शव नहीं दिया जाएगा!
परिजनों ने गांववालों से उधार लेकर 2 लाख रुपये और जमा किए, लेकिन फिर भी शव देने से इनकार कर दिया गया। अस्पताल का सख्त रुख था—“अब भी 3,46,288 रुपये बाकी हैं, बिना पैसे के लाश नहीं मिलेगी!”
परिजन गिड़गिड़ाए, लेकिन पारस हॉस्पिटल के दिल में दया नहीं!
मृतक के छोटे भाई सिंटू ने अस्पताल के अधिकारियों के सामने रोते हुए हाथ जोड़कर शव देने की विनती की। परिजनों ने लिखित में देने की भी पेशकश की कि वे बाकी पैसे बाद में चुका देंगे, लेकिन हॉस्पिटल के प्रबंधन ने इसे ठुकरा दिया।
“अगर तुम्हारे पास पैसे नहीं हैं, तो शव भी नहीं मिलेगा!” – पारस हॉस्पिटल की क्रूरता ने इंसानियत को शर्मसार कर दिया।
मीडिया और नेताओं के दबाव में घुटने टेके पारस हॉस्पिटल ने!
जब मामला सार्वजनिक हुआ और एक अखबार ने इसे उजागर किया, तो स्वास्थ्य विभाग पर दबाव बढ़ गया।स्थानीय ग्राम कचहरी राघोपुर खरीक के सरपंच और भाजपा ओबीसी मोर्चा के नवगछिया जिला अध्यक्ष प्रमोद मंडल ने बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय के सचिव से मामले में दखल देने की मांग की। इसके बाद लगातार दबाव बनता गया और अंततः 80,000 रुपये में मामला ‘सेटल’ कर परिजनों को शव सौंप दिया गया।
पारस हॉस्पिटल: ‘मौत की मंडी’ बन चुका है यह अस्पताल!
यह कोई पहला मामला नहीं है जब पारस हॉस्पिटल ने इस तरह की शर्मनाक हरकत की हो। पहले भी कई रिपोर्ट्स सामने आई हैं, जहां गरीब मरीजों से इलाज के नाम पर लाखों रुपये ठगे गए और मौत के बाद शव तक को बंधक बना लिया गया!
- पारस हॉस्पिटल के खिलाफ पहले भी अनैतिक वसूली और लापरवाही की कई शिकायतें आ चुकी हैं।
- कई मरीजों के परिजन इलाज में जबरदस्ती महंगे टेस्ट और दवाइयों के लिए दबाव डालने का आरोप लगा चुके हैं।
- कुछ मामलों में तो अस्पताल ने बिना परिजनों की अनुमति के मरीजों को वेंटिलेटर पर डालकर बिल बढ़ाने का खेल भी किया है!
स्वास्थ्य विभाग और सरकार कब लेगी एक्शन?
अब सवाल यह उठता है कि क्या स्वास्थ्य विभाग और सरकार इन घिनौनी हरकतों पर कोई कार्रवाई करेगी? या फिर पारस हॉस्पिटल ऐसे ही गरीबों का खून चूसता रहेगा?
✅ क्या पारस हॉस्पिटल का लाइसेंस रद्द होगा?
✅ क्या मरीजों से जबरन वसूली करने वाले अस्पतालों पर कार्रवाई होगी?
✅ क्या लाशों पर भी अब मोलभाव चलता रहेगा?
अगर सरकार और स्वास्थ्य विभाग ने अब भी चुप्पी साधे रखी, तो यह साफ हो जाएगा कि बड़े प्राइवेट अस्पतालों के साथ मिलीभगत का खेल चल रहा है!
अब वक्त आ गया है कि जनता ऐसे अस्पतालों की लूटखसोट और अमानवीयता के खिलाफ आवाज उठाए! ताकि कोई और गरीब परिवार इस तरह के जुल्म का शिकार न हो।
ब्यूरो रिपोर्ट: दैनिक बिहार पत्रिका
Author: दैनिक बिहार पत्रिका
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