खगड़िया की इस कहानी में मौत हुई थी सलाखों के पीछे, लेकिन इंसाफ की शुरुआत हुई इंसानियत के एक दस्तावेज़ से। अंगद दास नाम था उस बंदी का, जिसकी सांसें थम गई थीं उपकारा, उदाकिशुनगंज की अंधेरी कोठरी में। परिवार गम में डूबा था, लेकिन इंसाफ की उम्मीद अब भी बाकी थी।
यह सिर्फ एक मौत नहीं थी, यह सवाल था उस सिस्टम पर जिसने न्याय की परिभाषा को वर्षों से लाचार बना रखा है। लेकिन इस बार कहानी थोड़ी अलग थी…
जब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले को गंभीरता से लिया, तो सत्ता के गलियारे हिल उठे। आयोग के निर्देश पर सरकार को आखिरकार मानवीयता दिखानी पड़ी और अंगद दास के परिजन को मुआवजा देने का फैसला किया गया।
राज्य सरकार ने वित्तीय वर्ष 2024-25 की सामाजिक सुरक्षा मद से एक लाख रुपये की राशि स्वीकृत की। यह वही क्षण था जब इंसाफ कागज़ों से निकलकर ज़मीनी हकीकत में बदलने लगा।
26 मार्च 2025—वो तारीख, जब इंसाफ का पहला कदम धरती पर पड़ा। खगड़िया के गोगरी प्रखंड कार्यालय में, एक महिला ने कांपते हाथों से वह चेक थामा, जिसमें उसके पति की मौत का मुआवजा लिखा था—₹1,00,000।
बीडीओ गोगरी ने विधिवत भुगतान की प्रक्रिया पूरी की। दस्तावेज़ों पर अंगूठा लगा, नाम लिखा गया, और एक परिवार को थोड़ी राहत मिली—शायद जिंदगी की जद्दोजहद में थोड़ी ताक़त भी।
इस पूरी कार्रवाई की जिम्मेदारी जिलाधिकारी खगड़िया ने खुद संभाली। मुआवजे का भुगतान सिर्फ एक रकम नहीं था, यह एक प्रतीक था—यह भरोसे की लौ थी, जो बताती है कि अगर आवाज उठाई जाए तो सिस्टम भी झुक सकता है।
अब यह मामला मानवाधिकार आयोग को रिपोर्ट के साथ सौंपा जाएगा। परिजन को राहत मिली, लेकिन सवाल अभी बाकी हैं—क्या जेलों में बंद हज़ारों अंगद दासों की ज़िंदगी भी अब सरकार की नज़रों में आएगी?
यह कहानी एक मौत से शुरू हुई, लेकिन इंसाफ पर खत्म हुई। और शायद, यही सबसे बड़ी जीत है।
ब्यूरो रिपोर्ट, दैनिक बिहार पत्रिका
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