मिडिल ईस्ट में युद्ध के कारण जहाजों और उड़ानों पर असर, तेल की कीमतें बढ़ीं; संकट के बीच भारत ने मदद का हाथ बढ़ाया।
नई दिल्ली | अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच जारी भीषण युद्ध ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है। इस संघर्ष का असर अब केवल सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, तेल बाजार और मिडिल ईस्ट की फूड सिक्योरिटी पर भी गहरा संकट मंडरा रहा है।
इसी बीच भारत ने मानवीय पहल करते हुए मिडिल ईस्ट के देशों की मदद के लिए जहाजों के जरिए सैकड़ों टन राहत सामग्री भेजी है। युद्ध की वजह से जब कई देशों के जहाज और उड़ानें प्रभावित हो गईं, तब भारत की इस पहल ने क्षेत्र के देशों को बड़ी राहत दी है।
28 फरवरी से शुरू हुआ युद्ध
रिपोर्ट के अनुसार यह युद्ध 28 फरवरी 2026 को तब शुरू हुआ जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर सैन्य हमला किया। अमेरिका ने इस अभियान को “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” नाम दिया है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस सैन्य कार्रवाई को ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं को रोकने का कदम बताया है। युद्ध की शुरुआती कार्रवाई में ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के मारे जाने की खबर ने ईरानी राजनीति को बड़ा झटका दिया।
मिसाइल और ड्रोन हमलों से बढ़ा तनाव
खामेनेई की मौत के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए इजराइल और अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले शुरू कर दिए। खाड़ी क्षेत्र में भी कई ठिकानों को निशाना बनाया गया।
9 मार्च 2026 तक यह युद्ध अपने दसवें दिन में पहुंच चुका था। अमेरिका और इजराइल ने ईरान के तेल डिपो, मिसाइल साइट्स, आईआरजीसी (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स) के मुख्यालय और न्यूक्लियर ठिकानों पर लगातार हमले किए।
वहीं जवाबी कार्रवाई में ईरान ने इजराइल पर कई मिसाइलें दागीं, जिनमें क्लस्टर म्यूनिशन के इस्तेमाल की भी खबरें सामने आई हैं। इस संघर्ष में कम से कम 7 अमेरिकी सैनिकों की मौत की भी पुष्टि हुई है।
तेल बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर
युद्ध का असर वैश्विक तेल बाजार पर साफ दिखाई दे रहा है। ब्रेंट क्रूड की कीमतें तेजी से बढ़कर प्रति बैरल ऊंचे स्तर पर पहुंच गई हैं। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक तेल की कीमतों में लगभग 20 प्रतिशत तक उछाल आया है।
दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल की आपूर्ति का रास्ता माने जाने वाले स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में जहाजों की आवाजाही भी काफी प्रभावित हुई है। बताया जा रहा है कि समुद्री यातायात में 30 प्रतिशत से अधिक गिरावट आई है।
मिडिल ईस्ट में फूड सिक्योरिटी संकट
युद्ध के कारण मिडिल ईस्ट के कई देशों में फूड सिक्योरिटी का संकट भी गहराने लगा है। संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब समेत कई देश अपनी जरूरत का 90 प्रतिशत से अधिक खाद्य पदार्थ आयात करते हैं।
रेगिस्तानी भूगोल और सीमित कृषि उत्पादन के कारण ये देश सामान्य समय में यूरोप, एशिया और अमेरिका से फल, सब्जियां और अनाज मंगाते हैं। लेकिन युद्ध और समुद्री मार्गों के बाधित होने से खाद्य आपूर्ति प्रभावित हो रही है।
इसके साथ ही कई अंतरराष्ट्रीय उड़ानें भी रद्द हो चुकी हैं। आमतौर पर अंतरराष्ट्रीय यात्री विमानों के कार्गो हिस्से में बड़ी मात्रा में ताजे फल और खाद्य उत्पाद भी भेजे जाते हैं, लेकिन उड़ानों के प्रभावित होने से आपूर्ति श्रृंखला पर असर पड़ा है।
भारत ने बढ़ाया दोस्ती का हाथ
इस संकट के बीच भारत ने मानवीय भूमिका निभाते हुए मिडिल ईस्ट के देशों की मदद के लिए राहत सामग्री भेजी है। भारत द्वारा भेजे गए जहाजों में खाद्यान्न और जरूरी सामग्री शामिल बताई जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का यह कदम क्षेत्रीय स्थिरता और मानवीय सहयोग का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
भारत के लिए भी चुनौती
हालांकि यह युद्ध भारत के लिए भी चिंता का विषय है, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का 55 से 60 प्रतिशत कच्चा तेल खाड़ी देशों जैसे इराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत से आयात करता है।
यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो इसका असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिति पर भी पड़ सकता है।
Author: दैनिक बिहार पत्रिका
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