हिन्दी भाषा साहित्य परिषद की कवि गोष्ठी में गूंजी संवेदनाओं की आवाज, कविताओं ने बांधा समां

खगड़िया । शब्दों की खुशबू, भावनाओं की गहराई और समाज की सच्चाइयों से रूबरू कराती कविताओं के बीच हिन्दी भाषा साहित्य परिषद, खगड़िया द्वारा परिषद कार्यालय क्रांति भवन, कृष्णा नगर में एक साहित्यिक बैठक सह कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में जिले के साहित्यकारों और कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रेम, संघर्ष, सामाजिक विसंगतियों, मानवीय संवेदनाओं और बदलाव की आवश्यकता को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार अशोक कुमार चौधरी ने की, जबकि मुख्य अतिथि के रूप में चेन्नई से आए प्रसिद्ध कवि एवं गीतकार डॉ. ईश्वर करुण उपस्थित रहे। गोष्ठी का संचालन साहित्यकार शंकरानंद ने किया।

गोष्ठी की शुरुआत डॉ. ईश्वर करुण की गीतात्मक प्रस्तुति से हुई। उन्होंने प्रेम, विश्वास और मानवीय रिश्तों की गरिमा को अपनी रचना के माध्यम से अभिव्यक्त करते हुए श्रोताओं को भावुक कर दिया। उनकी प्रस्तुति पर उपस्थित साहित्य प्रेमियों ने जमकर तालियां बजाईं।

इसके बाद एक के बाद एक कवियों ने अपनी रचनाओं से माहौल को साहित्यिक रंगों से सराबोर कर दिया। कवयित्री ललिता कुमारी ने सपनों और स्वतंत्र उड़ान की आकांक्षा को स्वर दिया तो डॉ. सोहन कुमार सिन्हा ने जीवन के संघर्षपूर्ण दिनों को याद करते हुए अपनी मार्मिक कविता सुनाई। कवि राजेन्द्र राजेश ने मुस्कान और प्रेम की शक्ति को अपनी रचना में पिरोया, वहीं रामकृष्ण आनंद ने जीवन के अनसुलझे सवालों को कविता के माध्यम से सामने रखा।

डॉ. सुनील कुमार मिश्र ने सामाजिक विडंबनाओं और व्यवस्था पर तीखा प्रहार किया। वहीं शंकरानंद की कविता में समाज के उस वर्ग का दर्द झलकता दिखा, जो दूसरों को आगे बढ़ाने में अपना जीवन खपा देता है, लेकिन स्वयं उपेक्षा का शिकार रहता है।

युवा कवयित्री अनुभूति ने शिक्षा और जागरूकता के माध्यम से बिहार को आगे बढ़ाने का संदेश दिया। डॉ. पुष्पा कुमारी ने अपनी मैथिली रचना में गरीबों की पीड़ा और भ्रष्ट व्यवस्था पर चिंता व्यक्त की। संध्या किंकर और शशि शेखर ने भी अपनी कविताओं से श्रोताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे अशोक कुमार चौधरी ने किसानों और श्रमिकों की स्थिति पर केंद्रित अपनी रचना सुनाकर समाज की विडंबनाओं को उजागर किया। उनकी प्रस्तुति को श्रोताओं ने खूब सराहा।

गोष्ठी के दौरान बार-बार तालियों की गूंज सुनाई देती रही। साहित्यकारों ने कहा कि कविता केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने और जनचेतना जगाने का सशक्त साधन है। आज के दौर में साहित्य की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है।

कार्यक्रम के अंत में संध्या किंकर ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए सभी कवियों, साहित्य प्रेमियों एवं अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया। गोष्ठी का समापन साहित्य, संस्कृति और समाज के प्रति नई ऊर्जा एवं सकारात्मक सोच के संदेश के साथ हुआ।

रिपोर्ट: कृष्णा टेकरीवाल, दैनिक बिहार पत्रिका 

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